शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

बोलतीं है...

कभी हद से बढ़कर कहां बोलतीं है ।
मेरी  गज़ले  मेरी  जुबां  बोलतीं  है ।
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तुम्हीं  से शुरू मेरे  दिल की है दुनिया
तुम्हें   ही  जमीं  आसमां  बोलतीं  है ।
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कई नामचीन  चहरे  मरते है उस पे,
मगर वो  हमें अपनी  जां बोलतीं है ।
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जला  करते  है  फूल  उनसे है सारे,
मेरा  नाम  जब  भी जहां बोलतीं है ।
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हमें सिर्फ  वो  ही  नही जान  अपनी,
फलां और फलां और फलां बोलतीं है
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Rais Pithampuri. .....

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

सोमवार, 20 जून 2016

लिखूँगा

तेरे हुक्म पे इल्तिज़ा पे लिखूँगा |
मैं अब शेर तेरी अदा पे लिखूँगा |
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अगर मिल गई जो हुकूमत जहां की
तेरा नाम मैं आसमाॅ पे लिखूँगा |
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रविवार, 15 मई 2016

वास्तें

छोड़कर हमको गया जो... अजनबी के वास्तें ।
अब दया दिल में नही उस... आदमी के वास्तें ।
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बेवफ़ा कहकर पराया.. कर दिया हमने जिसे,
गिर रहे है अब भी आँसू... बस उसी के वास्तें ।
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है अजब सा सिलसिला कुछ इश्क़ की बरसात का,
आसमाँ भी चीख... पड़ता है जमीं के वास्तें ।
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इश्क़ के जख्मों से अच्छा... दोस्ती का मर्तबा
जान भी कुर्बान........ मेरी दोस्ती के वास्तें ।
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आस और उम्मीद छोडों और सो जाओ रईस
कब तलक..... जागे रहोगे चांदनी के वास्तें ।
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••••• Rais Pithampuri •••••
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शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

Lout aati hai

दुआ मै हाथ उठतें ही तरंगे लोट आती है |
तेरे दर से दवा बनकर उमंगे लौट आती है |
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गुमां में तैर तो जाती हैं वो ऊँचीं उड़ानों में,
मगर जब शाम होती है पतंगे लौट आती है |
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बुधवार, 20 अप्रैल 2016

पैरवी

जिद कहूँ या जुस्तजू की पैरवी |
दिल करे अब आरजू की पैरवी |
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छोड दी है अब खुदा पर अस्मतें,
अब कठिन है आबरू की पैरवी |
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कत्ल का किस्सा बयां करती रही,
सुर्ख   होठों  पे  लहू  की  पेरवी |
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चांद तारों को सुबह ले जायगी ,
फिर करूं क्यूं फालतू की पैरवी |
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रात दिन है ज़ेहन से दिल लड़ रहा,
कर  रहा  है  गुफ्तगू  की  पैरवी |
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☪RAIS PITHAMPURI☪

शुक्रवार, 18 मार्च 2016

बुधवार, 9 मार्च 2016

कब से ये काँटों में हैं और ज़ख्म खाए हैं गुलाब?

कब से ये काँटों में हैं और ज़ख्म खाए हैं गुलाब?
अपने खूँ के लाल रंगों में नहाये हैं गुलाब।

फर्क इतना है हमारी और उसकी सोच में,
उसने थामी हैं बंदूकें, हम उठाये हैं गुलाब।

होश अब कैसे रहे, अब लड़खड़ाएँ क्यों न हम,
घोल कर उसने निगाहों में, पिलाये हैं गुलाब।

अब असर होता नहीं गर पाँव में काँटा चुभे,
ज़िन्दगी तूने हमें ऐसे चुभाये हैं गुलाब।

कुछ पसीने की महक, कुछ लाल मेरे खूँ का रंग,
तब कहीं जाकर ज़मीं ने ये उगाये हैं गुलाब।

खार होंगे, संग होंगे, और होगा क्या वहां?
इश्क की गलियों में सरवर किसने पाए हैं गुलाब