क्या हंसी यार कि सूरत है नज़ाकत क्या हैं ।
कोई पूछें मेरे दिल से मेरी हालत क्या हैं ।
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यार की बाहों में मदहोश हुए बैठा हूँ,
अब मुझे होश में आने कि जरूरत क्या है
जरूरत क्या है


क्या हंसी यार कि सूरत है नज़ाकत क्या हैं ।
कोई पूछें मेरे दिल से मेरी हालत क्या हैं ।
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यार की बाहों में मदहोश हुए बैठा हूँ,
अब मुझे होश में आने कि जरूरत क्या है
घड़ियां तवील खौफ़ की बारिश मे कट गई
फिर एक रात मौत की ख्वाहिश मे कट गई
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दुनियां से भाई - चारा निभाने के बावजूद
गर्दन हमारी आपसी रंजिश मे कट गई
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इक दिन मिला ना वक्त इबादत के वास्तें
मेरी पतंग ए उम्र नुमाइश मे कट गई
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.......... RAEES BASHAR
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मेरे आगाज़ का अंजाम जरूरी तो नही
हो तेरे साथ मेरा नाम जरूरी तो नही
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था मेरे दम से चराग़ाँ कभी बाज़ार मगर
अब भी ऊंचा हो मेरा दाम जरूरी तो नही
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जिस के मैैं नाम से बदनाम हूं वो मेरी तरह
हो मेरे नाम से बदनाम जरूरी तो नही
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........... Raees BasHar
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ज़ख़्मी ज़ख़्मी है जिगर लब पे तरफ़दारी है
ये मुहब्बत भी अजब तरह की बीमारी है
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मेरी ग़ज़लों में सिवा इश्क़ के कुछ खास नही
खास तो आपके पढ़ने की अदाकारी है ।
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वो बहुत देर तलक राह नही देखेंगे
जल्दी आ जाओ मेरे दफ़्न की तैयारी है ।
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रोज़ आ जाते है यादों की ये मय्यत लेकर
अब भी नींदों पे वो ख़्वाबों का सितम जारी है
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क्यूं किसी और के शेरों में कमी ढुंढें "रईस"
तेरे शेरों में भी उस्ताद की फनक़ारी है ।
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✒ .....Raees BasHar....
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नकाबपोश भी जलवे दिखा के चलते है
अजीब शौक है पर्दा उठा के चलते है
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हरेक शय हुई है खाक दीद से उनकी
नसीब हम भी चलो आजमा के चलते है
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तमाम जिंदगी पैरों में रौंदते वाले
ज़नाज़ा कद के बराबर उठा के चलते है
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गिरे हुए को उठाना है मुखतलिफ जज्बा
उठे हुए को तो सारे गिरा के चलते है
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अजीब सा नया फैशन चलन मे आया है
शरीफ लोग भी काॅलर चडा के चलते है
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✒.... RAEES BASHAR
तसव्वुर मे सही लेकिन अजब मंजर बनाता हूं
मैं काग़ज़ के सिपाही काटकर लश्कर बनाता हूं
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इमारत की सभी ईंटें लहू से सींचकर अपने
अमीर - ए - शहर तेरे वास्तें मैं घर बनाता हूं
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खयालों का मैं अपने मालिको मुख्तार हूं साहेब
सभी मसनदनशीं को ख्वाब मे नौकर बनाता हूं
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किसीको क़त्ल करने का है मेरा मुख़्तलिफ़ जज़्बा
मै पानी को जमा कर बर्फ के ख़ंजर बनाता हूँ
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तुम्हारी नफरते जायज नही मेरी गरीबी पर
तुम्हारी कार के अक्सर मैं ही पंचर बनाता हूं
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✒...... RAEES BASHAR...
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चाँद को छत पे अपनी बुला लीजिये
आप पहलू में उनको बिठा लीजिये
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अच्छी लगती नही बद्लियां चाँद पे
अपने चैहरे से जुल्फें हटा लीजिये
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दर्द दहलीज़ पर छोड़कर हम चले
आखिरी खत हमारा उठा लीजिये
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रूह से रूह होती नही रू-ब-रू
जिस्म को दरमियां से हटा लीजिये
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इक वरक़ पर लिखा जो मैने लफ़्ज़-ए-इश्क़
उतरा काग़ज़ पे रंग-ए-हिना लीजिये
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✒......... *Rais pithampuri*