शुक्रवार, 18 मार्च 2016

कत्ल

कत्ल का किस्सा बयां करती रही
सुर्ख   होठों   पे   लहू  की  पेरवी

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बुधवार, 9 मार्च 2016

कब से ये काँटों में हैं और ज़ख्म खाए हैं गुलाब?

कब से ये काँटों में हैं और ज़ख्म खाए हैं गुलाब?
अपने खूँ के लाल रंगों में नहाये हैं गुलाब।

फर्क इतना है हमारी और उसकी सोच में,
उसने थामी हैं बंदूकें, हम उठाये हैं गुलाब।

होश अब कैसे रहे, अब लड़खड़ाएँ क्यों न हम,
घोल कर उसने निगाहों में, पिलाये हैं गुलाब।

अब असर होता नहीं गर पाँव में काँटा चुभे,
ज़िन्दगी तूने हमें ऐसे चुभाये हैं गुलाब।

कुछ पसीने की महक, कुछ लाल मेरे खूँ का रंग,
तब कहीं जाकर ज़मीं ने ये उगाये हैं गुलाब।

खार होंगे, संग होंगे, और होगा क्या वहां?
इश्क की गलियों में सरवर किसने पाए हैं गुलाब

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

जोधा अकबर

मुहब्बत हम जताएँगे जलालुद्दीन सी कब तक,
कभी जोधा बनो तुम भी जरा किरदार में आओ |

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गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

सुबह

दुनिया तो भुला देगी ही तू भी मुझे भुला,
जैसे की भुला देती है ख़्वाबों को ये सुबह |

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मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

रोज़ आतें है

तुम्हारी याद  के  जेवर  चुराने  रोज़ आतें  है |
हमारे  ख्वाब  में  डाकू  दिवानें  रोज़ आतें  है |

हमें मजनू  समझ  कर मारते है  गाँव के बच्चें,
हमारे जख्मों को पत्थर दिखाने रोज़ आतें है |

करोड़ो आज भी शहरी  यहाँ ग़ुरबत नहीँ भूलें,
शहर  से  गाँव  में चादर  चड़ाने रोज़ आतें है |

हमें सब पीठ फिरतें ही कहेंगे सिरफिरा आशिक,
मगर इस सिरफिरे को मुंह लगाने रोज़ आतें है |

अड़े है ज़िद पे तूफां भी फना कर दूँ चराग-ए-इश्क़,
मेरी हिम्मत की लौ को आजमाने रोज़ आतें है |

वो

गज़ल के तर्क से उठता धुआँ पहचानती है वो |
मेरे हर शेर को अपनी हकीकत  मानती है वो |

उन्हें कोई न सिखलाए दिलों से खेलना 'अय्युब,
वफाओं से मेरी खिलवाड़ करना जानती है वो |

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सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

लूट ली

कातिलों ने फिर से शौहरत लूट ली |
एक  बस्ती   से  शराफत   लूट  ली |

चीखतीं  चिल्ला  रही  थी "अस्मतें,,
ज़ालिमों ने फिर भी इज्ज़त लूट ली |

मिन्नते   करते   रहे   वो  रात   भर,
डाकुओं  ने  जिन से  दौलत लूट ली |

चम  चमाते   थे  मुहल्ले   में    सभी,
हादसे  ने  सब  से  राहत   लूट  ली |

जब  खबर  आई  सुबह अखबार में,
वाकिये  ने  खूब  जिल्लत  लूट  ली |

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▪○ Rahish Pithampuri ○▪