शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

लिखूँगा

तेरे हुक्म पर इल्तिजा पर लिखूँगा
मैं अब शेर तेरी अदा पर लिखूंगा

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हुकूमत मिली गर मुझे इस जहाँ की
तिरा नाम मैं चन्द्रमा पर लिखूँगा

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बहुत लिख लिया बेवफ़ाई पर मैंने
ग़ज़ल कोई तेरी वफ़ा पर लिखूँगा

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निगाहें झुका कर तेरा मुस्कुराना
सनम तेरी शर्म ओ हया पर लिखूँगा

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तेरा इश्क़ ही अब ख़ुदा है हमारा
मैं जब भी लिखूँगा ख़ुदा पर लिखूंगा

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शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

नजरअंदाज

हमारे बीच में जो फासले है कम नही होंगे |
तुम्हारी याद मे अब नैन मेरे नम नही होंगे |

नजरअंदाज कर लो आज लेकिन याद रखना तुम
हमारी याद आएगी तुम्हे जब हम नही होंगे |

मेरे दिल मे बना नासूर वो तेरा कहा हर लफ्ज़ ,
रहूंगी खुश वहाॅ पर मैं जहाॅ पर तुम नही होंगे |
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शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

बोलतीं है...

कभी हद से बढ़कर कहां बोलतीं है ।
मेरी  गज़ले  मेरी  जुबां  बोलतीं  है ।
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तुम्हीं  से शुरू मेरे  दिल की है दुनिया
तुम्हें   ही  जमीं  आसमां  बोलतीं  है ।
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कई नामचीन  चहरे  मरते है उस पे,
मगर वो  हमें अपनी  जां बोलतीं है ।
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जला  करते  है  फूल  उनसे है सारे,
मेरा  नाम  जब  भी जहां बोलतीं है ।
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हमें सिर्फ  वो  ही  नही जान  अपनी,
फलां और फलां और फलां बोलतीं है
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Rais Pithampuri. .....

सोमवार, 20 जून 2016

लिखूँगा

तेरे हुक्म पे इल्तिज़ा पे लिखूँगा |
मैं अब शेर तेरी अदा पे लिखूँगा |

अगर मिल गई जो हुकूमत जहां की
तेरा नाम मैं आसमाॅ पे लिखूँगा |

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रविवार, 15 मई 2016

वास्तें

छोड़कर हमको गया जो... अजनबी के वास्तें ।
अब दया दिल में नही उस... आदमी के वास्तें ।

बेवफ़ा कहकर पराया.. कर दिया हमने जिसे,
गिर रहे है अब भी आँसू... बस उसी के वास्तें ।

है अजब सा सिलसिला कुछ इश्क़ की बरसात का,
आसमाँ भी चीख... पड़ता है जमीं के वास्तें ।

इश्क़ के जख्मों से अच्छा... दोस्ती का मर्तबा
जान भी कुर्बान........ मेरी दोस्ती के वास्तें ।

आस और उम्मीद छोडों और सो जाओ रईस
कब तलक..... जागे रहोगे चांदनी के वास्तें ।

••••• Rais Pithampuri •••••

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शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

Lout aati hai

दुआ मै हाथ उठतें ही तरंगे लोट आती है |
तेरे दर से दवा बनकर उमंगे लौट आती है |

गुमां में तैर तो जाती हैं वो ऊँचीं उड़ानों में,
मगर जब शाम होती है पतंगे लौट आती है |

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बुधवार, 20 अप्रैल 2016

पैरवी

जिद कहूँ या जुस्तजू की पैरवी |
दिल करे अब आरजू की पैरवी |

छोड दी है अब खुदा पर अस्मतें,
अब कठिन है आबरू की पैरवी |

कत्ल का किस्सा बयां करती रही,
सुर्ख   होठों  पे  लहू  की  पेरवी |

चांद तारों को सुबह ले जायगी ,
फिर करूं क्यूं फालतू की पैरवी |

रात दिन है ज़ेहन से दिल लड़ रहा,
कर  रहा  है  गुफ्तगू  की  पैरवी |

☪RAIS PITHAMPURI☪