मंगलवार, 19 मई 2015

तेरे लिये एक ख़त लिख रहा हूँ

तेरे लिये एक ख़त लिख रहा हूँ
वक़्त ऐ शब है ग़ज़ल लिख रहा हूँ
अपनी चाहत पे मैं कुछ हर्फ़ लिख रहा हूँ
तनहा हूँ तन्हाई के आलम में बैठा
न जाने मैं क्यों और क्या लिख रहा हूँ
एक फूल अच्छा लगता है मुझको
मैं उस के लिये ये सब लिख रहा हूँ
सारे ज़माने को तो मुझसे उल्फत नहीं
सिर्फ एक शख्स के लिये लिख रहा हूँ
हिज्र की तल्खी से तंग आकर मैं
सनम के नाम एक ख़त लिख रहा हूँ
वो मुझको चाहे या न चाहे
मैं तो सिर्फ अपना दर्द लिख रहा हूँ
शायद उस तक मेरी बात पहुँचे
इस उम्मीद में मैं ये ग़ज़ल लिख रहा हूँ ।

"सलमान सिद्दीकी"

सोमवार, 18 मई 2015

तहरीक ऐ इंसानसाज़ी

चलो एक तहरीक चलाया जाये ।
इंसान को इंसान बनाया जाये ।

फूलों को न यूँ तोड़ा जाये ।
किरदार से जहाँ को महकाया जाये ।

भूखे को खाना खिलाया जाये ।
प्यासे को पानी पिलाया जाये 

दिल न किसी का दुखाया जाये ।
रोते को फ़क़त हँसाया जाये ।

ज़ालिम की मज़म्मत की जाये ।
मज़लूम की हिमायत की जाये ।

फ़र्ज़ है यही इंसान का "सलमान" ।
यही सभी को समझाया जाये ।

चलो एक तहरीक चलाया जाये ।
इंसान को इंसान बनाया जाये ।

"सलमान सिद्दीकी"