शुक्रवार, 5 जून 2015

**बेवफा यार**

खुद को बावफा मुझे बेवफा का इलज़ाम दिया है
हाँ उसने ये ज़ख्म मुझे ज़माने में सरेआम दिया है

शबे तन्हाई सुबह की याद शाम की बेबसी
फ़राज़ ये सारे दर्द उसने मुझे इनाम दिया है

मैं ग़म की उस दहलीज़ पे आके बैठा हूँ इस वकत
हर लम्हा याद-ए-जलन का उसने काम दिया है

अब मिलता है तो बहोत मज़ाक बनाता है मेरा वो
जिसने अरसा पहले दिल अपना मेरे नाम किया है

हो सके तो मुहब्बत से तोबा कर लो यारों
किसी ने बेइन्तहां भरे बाजार में मुझे बदनाम किया है

मंगलवार, 26 मई 2015

***खुली किताब***

मेरे दुश्मन जो ना समझ पाएं हूँ ऐसी पहेली फ़राज़

मेरे अपनों के लिए एक खुली किताब हूँ मैं

#सरफ़राज़_अहमद

सोमवार, 25 मई 2015

हाँ ये सच है जीने का कोई अरमान नहीं अब
तुझसे बिछड़ कर दिल का कोई मेहमान नहीं अब

मेरी ज़िन्दगी भी अब मुझसे पनाह मांगती है
तनहा दिल पे फ़राज़ कोई मेहरबान नहीं अब

तेरा साथ था तो जानती थी सारी दुनियां मुझको
तुझसे होके जुदा किसी से जान पहचान नहीं अब

बैठा कर मेरे यार पास बहलाते हैं मुझे
हूँ मैं भी समझदार कोई नादान नहीं अब

#सरफ़राज़_अहमद

रविवार, 24 मई 2015

***बेवफा***

उसे लगता था जुदा होके मैं मर जाऊंगा
ये और बात थी की मुहब्बत को किधर जाऊंगा

ज़माने को थी जलन मेरे रिश्ते से
वो जानता था तेरे साथ मैं निखर जाऊंगा

भटकता रहता हूँ रातों में चाँद तारों के बीच
तुझको भूलूंगा कैसे मैं जो घर जाऊंगा

अब तो ज़िद भी करता है मेरा दर्द-ए-दिल
तेरा अक्स जिधर होगा मैं उधर जाऊंगा

दिन भर एक एक टुकड़ों को समेटता हूँ जाने कैसे कैसे
रात हुई तो फ़राज़ मैं फिर से बिखर जाऊंगा

#सरफ़राज़_अहमद

शनिवार, 23 मई 2015

****मोदी तुमपे एक लफ्ज़****

****मोदी तुमपे एक लफ्ज़****


गर करना है नाम तुमसा तो बदनाम हम भले
मोदी तेरे काम से बेकाम हम भले

देख हर शख्स कर रहा है तेरी गलतियों को उजागर
तेरी जान पहचान से अनजान हम भले

तेरे मज़हब ने गर सिखाया है तुझको लड़ना झगड़ना
बा खुदा सिख हिन्दू ईसाई से मुसलमान हम भले

#सरफ़राज़_अहमद

***मेरी सोच***

हो गर शाम का मंज़र घर जाएँ तो अच्छा है
दर्द जब हद से गुज़रे आँख भर जाएँ तो अच्छा है

कभी गर हो ज़िन्दगी में अपनों से लड़ाई
उस मौके पे फ़राज़ हम हार जाएँ तो अच्छा है

मुहब्बत में लोगों को बस रोते ही देखा है
बिना इश्क़ के ज़िन्दगी गुज़र जाए तो अच्छा है

जो दिखे ख्वाब में होते हुए अपनों से जुदाई
या खुदा वह ख्वाब बिखर जाएँ तो अच्छा है

चाहें भले लग जाये कई अरसे गुज़रने में
हो राहें मंज़िल की जिस तरफ उधर जाएँ तो अच्छा है