मंगलवार, 26 मई 2015

रोज़ नयी गज़ले नदीम सिद्दीक़ी के साथ

सिर्फ़ आने का  गुमाँ होता है !
उनका दीदार  कहाँ होता है ! !

ये बता दो ऐ हवाओं मुझको !
क्या मेरा ज़िक्र वहाँ होता है ! !

है मोहब्बत का ग़म अजीबो ग़रीब !
शक्ल से ही जो  अयाँ होता है ! !

ऐ मेरे दोस्त  मेरी ग़ज़लों मे  !
हाल दिल का ही बयाँ होता है ! !

रात दिन हम तड़प रहे हैं " नदीम " !
क्या कहें दर्द  कहाँ होता है ! !

- - - - नदीम सिद्दीक़ी - - - -

मंगलवार, 19 मई 2015

रोज़ एक शायर आज नदीम सिद्दीक़ी

हर शख़्स इस जहान में हैरान सा क्यों है ! 
इंसान जो कल तक था वो हैवान सा क्यों है ! !

वीरानी सी हर एक तरफ़ छाई हुई है ! 
क्या हो गया इस शहर को वीरान सा क्यों है ! !

हर लम्हा यही सोच , यही फ़िक्र , यही ग़म ! 
इंसान की जाँ लेना भी आसान सा क्यों है ! !

हर सिम्त अँधेरा है हर इक रात है काली ! 
इस दौर में हर रास्ता सुनसान सा क्यों है ! !

सहमा सा हर इन्साँ है " नदीम " आज के युग में ! 
लाशों की तरह आदमी बेजान सा क्यों है ! !

नदीम सिद्दिक़ी

रोज़ एक शायर आज नदीम सिद्दीक़ी

आ जाओ दिल उदास है वीराँ है ज़िन्दगी ! 
आलम ये है के मौत का उनवाँ है ज़िन्दगी ! !

दिल की शिकस्तगी की शिकायत भी क्या करें ! 
ख़ुद अपने इन्तिख़ाब पे हैराँ है ज़िन्दगी ! !

इक बावफ़ा का साथ हो जिसके नसीब में ! 
उसके लिए बहार ब- दामाँ है ज़िन्दगी ! !

बदले हुए निज़ाम का आलम ही और है ! 
अब पूछिये न कितनी परेशाँ है ज़िन्दगी ! !

ऐ रहबराने मुल्क मुझे तुम ही कुछ बताओ ! 
क्यों अम्न की फ़ज़ा से गुरेज़ाँ है ज़िन्दगी ! !

अब आशियाँ किसी का जलाया न जाएगा ! 
दिल साफ़ है तो दर्द का दरमाँ है ज़िन्दगी ! !

एक एक ज़ख़्म तोहफ़ा है उनका ही ऐ " नदीम " ! 
उनके करम से रश्के - गुलिस्ताँ है ज़िन्दगी ! !

- - - - - नदीम सिद्दीक़ी - - - - -

रोज़ एक शायर आज नदीम सिद्दीक़ी

टूटे हुए सब अहदे वफ़ा  याद आएँगे !
चेहरा जो आईने मे कभी देखिएगा आप !
नदीम सिद्दीकी

शनिवार, 16 मई 2015

रोज़ एक शायर आज नदीम सिद्दीक़ी

मुझको हँसा- हँसा के रुलाने लगे हैं वो ! 
मत पूछिये के कैसे सताने लगे हैं वो ! !

आए हुए तो उनको अभी दो घड़ी हुईं ! 
क्या हो गया किस बात पे जाने लगे हैं वो ! !

हमने ही उम्र भर कोई शिकवा नहीँ किया ! 
एहसान आज हम पे जताने लगे हैं वो ! !

ठुकराया था जिन्होंने कभी ज़र की चाह में ! 
फिर आज मुझको अपना बनाने लगे हैं वो ! !

नींदें चुराते हैं मेरी आ- आ के ख़्वाब में ! 
बरसों का थमा दर्द जगाने लगे हैं वो ! !

अश्कों से हँसते खेलते ये ज़िन्दगी कटी ! 
मय्यत पे आज अश्क बहाने लगे हैं वो ! !

जबसे सुना उन्होंने मोहब्बत का है मज़ार ! 
आ-आ के रोज़ फूल चढ़ाने लगे हैं वो ! !

डसने लगी हैं अब तो बहारें भी ऐ " नदीम " ! 
और जिस्मो-जाँ में आग लगाने लगे हैं वो ! !

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नदीम सिद्दीक़ी